भारतीय शिक्षा
मनुष्य में जो संपूर्णता सुप्त रूप से विद्यमान है उसे प्रत्यक्ष करना ही शिक्षा का कार्य है। स्वामी विवेकानन्द                      There are no misfit Children, there are misfit schools, misfit test and studies and misfit examination. F.Burk                     शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य आंतरिक शक्तियों को विकसित एवं अनुशासित करने का है। डॉ. राधा कृष्णन                      ज्ञान प्राप्ति का एक ही मार्ग है जिसका नाम है, एकाग्रता और शिक्षा का सार है मन को एकाग्र करना। श्री माँ

राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं शिक्षा, वैश्विक सन्दर्भ


राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं शिक्षा, वैश्विक सन्दर्भ

श्री अतुल कोठारी

(सचिव, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास)

सरस्वती बाल मन्दिर, जी ब्लाक नारायणा विहार

नई दिल्ली-110028

सम्पर्क सूत्र :-9212385844, 9868100445

ईमेल :- atulabvp@rediffmail.com

राष्ट्र अर्थात क्या ?

ï  ऋग्वेद में लिखा है ”माता भूमि: पुत्रो·हं पृथिव्या:(भूमि माता के हम सब पुत्र हैं)

  • जहा एक निश्चित भू-भाग पर रहने वाले लोगों का समूह हो।
  • उस जन समूह के àदय में मातृभूमि के प्रति अपार श्रध्दा का भाव हो।
  • उस जन समूह के जीवन आदर्शो में साम्यता हो।
  • उस जन समूह के देखने की एक विशिष्ट दृष्टि हो।
  • उस जन समूह के शत्रु-मित्र समान हों।
  • उस जन समूह में ऐतिहासिक महापुरूषों के बारे में समान श्रध्दा भाव हो। समान परम्परा एवं महत्तवाकांक्षा से युक्त हो।

इसके आधार पर वहां एक संस्कृति का विकास होता है। जैसे हमारे देश में देखने को मिलता है।

राज्य अर्थात क्या?

  • समाज में आई विकृतियों को समाप्त करने एवं शान्ति स्थापित करने तथा समाज में आई जटिलताओं को सुलझाकर प्रत्येक व्यक्ति के लिये न्यायपूर्ण, सम्मानित जीवन सुकर बना देना यानी समाज में सुव्यवस्था स्थापित करना।
  • अन्य राज्यों से सम्बन्ध स्थापित करना एवं आतंरिक तथा बाहरी आक्रमणों से राष्ट्र की रक्षा करना।

देश अर्थात क्या?

  • भूमि और जन को मिलाकर देश बनता है।
  • देश एक दृश्यमान सत्ताा है, राष्ट्र अदृश्यमान सत्ताा है।
  • बिना देश हम किसी राष्ट्र की कल्पना नहीं कर सकते।

राष्ट्र का पुननिर्माण :-

आयोजकों ने यहां राष्ट्र का नव निर्माण के बदले पुनर्निर्माण शब्द का उपयोग किया है। क्योंकि पूर्व में हमारा राष्ट्र सर्वदृष्टि से सक्षम, समृध्द, सम्पन्न था तथा सारी व्यवस्थाएं भी श्रेष्ठ थीं। हमारा मूल आधार आध्यात्मिक था लेकिन भौतिक दृष्टि से भी हम समृध्द सम्पन्न थे इसलिए विदेशी आक्रांताओं ने लूट हेतु भारत पर आक्रमण किये। हमारी विभिन्न व्यवस्थाओं से सम्बन्धित चिन्तन सिध्दान्त तो शास्वत सत्य है, वह आज भी उतना ही प्रांसगिक है। इसलिए उन सिध्दान्तों के प्रकाश में वर्तमान (आधुनिक) समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप नई व्यवस्था निर्माण करनी होगी।

जैसे हम शिक्षा के सन्दर्भ में सोचते हैं तो प्राचीन समय में गुरूकुल व्यवस्था थी उसी स्वरूप में शायद आज सम्भव नहीं है (कुछ प्रयोग अवश्य हो सकते हैं, हो भी रहे हैं)  लेकिन उस समय की गुरू शिष्य परम्परा, परिवार भावना, शिक्षा यह व्यवसाय नहीं सेवा का माध्यम था आदि। यह संकल्पनाएँ आज भी उतनी ही प्रांसगिक हैं और आवश्यकता भी है। उस संकल्पना को आज के सन्दर्भ में ढ़ालना होगा।

शिक्षा का पुनर्निर्माण :-

युनेस्को की डेलर्स कमेटी के रिपोर्ट में कहा है कि किसी भी देश की शिक्षा उस देश की संस्कृति  एवं प्रगति के लिए होनी चाहिए (Education of any country is for culture and groth½

शिक्षा का लक्ष्य :-

असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतंगमय॥

असत्य से सत्य की ओर ले जायें, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाये, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाये। यही शिक्षा का लक्ष्य है। शिक्षा के लक्ष्य एवं जीवन के लक्ष्य में कोई अन्तर नहीं होना चाहिए।

शिक्षा से अभिप्राय है – छात्रों के व्यक्तित्व का समग्र विकास एवं चरित्र निर्माण तथा राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।

  • स्वामी विवेकानन्द :- मनुष्य में जो सम्पूर्णता सुप्तरूप से विद्यमान है उसे प्रकट करना ही शिक्षा का कार्य है।
  • प्रेमचन्द :- जिस शिक्षा में समाज और देश के कल्याण की चिन्ता के तत्व नहीं है, वह कभी सच्ची शिक्षा नहीं कही जा सकती।
  • डा. राधाकृष्णन :- हमारी शिक्षा तब तक अधूरी रहेगी, जब तक उसमें धार्मिक विचारों का समावेश नहीं किया जायेगा।
  • दीनानाथ बत्रा :& Education is for living and life.

छात्रों के व्यक्तित्व का समग्र विकास :-

उपनिषद् में पंचकोश :-

¨ अन्नयमय कोश          – शारीरिक विकास

¨ प्राणमय कोश            – प्राणिक विकास

¨ मनोमय कोश            – मानसिक विकास

¨ विज्ञानमय कोश          – बौध्दिक विकास

¨ आनन्दमय कोश          – आध्यात्मिक विकास

इसमें कोशों के अर्थ बताने का प्रयास किया है वह पूर्ण नहीं है समझने हेतु उसका निकटतम अर्थ देने का प्रयास किया है।

शरीर, प्राण, मन, बुध्दि, आत्मा इन पांचो के विकास से व्यक्ति का समग्र विकास होता है। वह व्यक्ति से व्यक्तित्व बनता है।

अभी कुछ दिन पूर्व एक समाचार पत्र में किरण बेदी का एक लेख था उसमे उन्होंने लिखा था कि मुझे एक कार्यक्रम में वक्तव्य देना था। उस समय मैं सोच रही थी किस विषय पर बोला जाये, बहुत सारे विषय मन में आए। बाद में एक विषय सबसे महत्तवपूर्ण  लगा कि आज देश में चरित्रवान व्यक्तियों की सबसे बड़ी कमी दिख रही है, फिर मैंने उसी पर अपना वक्तव्य केन्द्रित किया। यह वास्तविकता है इस कमी के परिणाम स्वरूप आज हमारे देश में अनेक प्रकार की समस्याएं व संकट दिख रहे हैं। इस सन्दर्भ की एक अंग्रेजी कहावत वर्तमान में प्रस्तुत है।

If wealth is lost nothing is lost

If health is lost something is lost

But character is lost everything is lost

इस सिध्दान्त के आधार पर वर्तमान की शिक्षा व्यवस्था का नये स्वरूप के बारे में चिन्तन आवश्यक है।

उपर्युक्त संकल्पना के आधार पर वर्तमान में शिक्षा का व्यावहारिक स्वरूप क्या हो :-

¨ मूल्यपरक शिक्षा : छात्रों के चरित्र निर्माण एवं राष्ट्रभक्ति तथा समाज सेवा का भाव जगाने हेतु प्रत्येक पाठयपुस्तकों में मूल्यों का समावेश हो। इस हेतु सभी स्तर पर सामाजिक कार्य को अनिवार्य किया जाना चाहिए।

¨  शारीरिक शिक्षा सभी स्तर पर अनिवार्य रूप से हो। खेल का प्रशिक्षण भी उसमें जोड़ना चाहिए।

¨  शिक्षा मात्र सैध्दान्तिक न होते हुए व्यावहारिकता से जोडनी होगी। (यह सभी स्तर पर आवश्यक है) शिक्षा श्रमप्रधान, कर्मप्रधान, कौशल्य निर्माण तथा रोजगार सृजन (नौकरी परक नहीं) हो।

¨  शिक्षा का प्राचीन एवं आधुनिकता तथा आध्यात्मिकता एवं भौतिकता का समन्वित स्वरूप  बने।

¨  शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो। सारी पाठयपुस्तकें भारतीय भाषाओं में तैयार हों।

¨  शिक्षा सरकार के शिकंजे एवं राजनीति के पंजों से मुक्त हो। इस हेतु राष्ट्रीय स्तर पर ”स्वायत्ता शिक्षा संस्थान” का गठन हो। उसकी रचना राज्य, जिला स्तर तक की जाये।

राष्ट्रीय एवं वैश्विक चुनौतियाँ एवं आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु :-

¨  आतंकवाद तथा राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती हेतु समाधान पाठयचर्या का हिस्सा हो।

¨  विद्यालयों में सैन्य शिक्षा को अनिवार्य करना।

¨  पर्यावरण संरक्षण।

¨  विज्ञान, आध्यात्मिकता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण।

¨  स्वास्थ्य शिक्षा।

¨  आर्थिक साम्राज्यवाद एक चुनौती।

¨  योग शिक्षा।

¨  राष्ट्रीय एवं सामाजिक आवश्यकताओं हेतु शोध कार्य को बढ़ावा देना।

शिक्षा का पुनर्निर्माण यह प्राथमिक एवं आधारभूत कार्य है। अपने कई महापुरूषों ने देश को समर्थ, समृध्द, शक्तिशाली, वैभव सम्पन्न, विश्वगुरू के स्थान पर पुन: प्रतिष्ठित करने की बात कही है। यह सारी बातें तभी सम्भव हाेंगी जब देश की शिक्षा का पुनरुत्थान होगा।



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