भारतीय शिक्षा
मनुष्य में जो संपूर्णता सुप्त रूप से विद्यमान है उसे प्रत्यक्ष करना ही शिक्षा का कार्य है। स्वामी विवेकानन्द                      There are no misfit Children, there are misfit schools, misfit test and studies and misfit examination. F.Burk                     शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य आंतरिक शक्तियों को विकसित एवं अनुशासित करने का है। डॉ. राधा कृष्णन                      ज्ञान प्राप्ति का एक ही मार्ग है जिसका नाम है, एकाग्रता और शिक्षा का सार है मन को एकाग्र करना। श्री माँ

पर्यावरण का वैश्विक संकट

पर्यावरण का वैश्विक संकट

          पर्यावरण के संरक्षण के अभाव के कारण देश एवं दुनिया में ब़ रहे जल संकट, प्रदुषित वायु, ओजोन की परत में ब़ रहे छिद्र, कम हो रहे जंगल एवं जानवर से समग्र सृष्टि में ब़ रहे असंतुलन पर राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का यह कार्यकारी मंडल गहरी चिंता व्यक्त करता है।

          देश में 33 प्रतिशत जंगल की आवश्यकता है लेकिन 10 प्रतिशत आसपास जंगल की उपलब्धता है साथ ही एशिया में सबसे कम उत्पादक जंगल हमारे है। भारत में प्रत्येक व्यक्ति हेतु 0.1 हैक्टर लकड़ी का क्षेत्र उपलब्ध है जो विश्व में सबसे कम प्रमाण है। उद्योग एवं जलाने हेतु आवश्यक लकडी का 1/3 हिस्सा हमारे देश में प्राप्य है देश में 75 प्रतिशत लोग अशुद्ध जल पीने को मजबूर है जो देश में व्याप्त अधिकतर महामारी की जड़ है, छुआछूत की 20 प्रतिशत बिमारी दूशित पानी से हो रही है। 11 करोड़ घरों में एवं 30 प्रतिशत विद्यालयों में शौचालय की व्यवस्था नहीं है। कानूनी प्रतिबंध के बावजूद 1 लाख से अधिक लोग आज भी मेला उठाने का कार्य कर रहे है। विश्व आरोग्य संगठन के अनुसार भारत में 80 प्रतिशत बिमारियाँ दुशित जल एवं अस्वच्छता के कारण हो रही है। उपयोग करो और फेंक दो (नेम जीतवनही) की प्रद्वति प्लास्टिक, थर्मोकोल से लेकर मनुष्य तक यह बात आगे ब़ चुकी है जिसका दुःप्रभाव भौतिक पर्यावरण से लेकर पारिवारिक एवं सामाजिक संबधों पर दिख रहा है। देश में जल का स्तर लगातार गिर रहा है। जल हेतु झगड़े आम बात हो गई है। दूसरी और गर्मी का प्रकोप लगातार ब़ रहा है। राजस्थान में गर्मी ने 109 वर्ष का रिकार्ड तोड़ दिया है। पर्यावरण के विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार यह प्रमाण और ब़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है। जिससे हिमालय उतर धुव्र आदि पर से बर्फ पिधलने की मात्रा ब़ी है। इस कारण से समुद्र का जल स्तर ब़ रहा है जिससे समुद्र के किनारे अनेकों गांव एवं शहरों पर संकट के बादल छाये है। हर वर्ष देश के आधे जिले अकाल या बा़ से प्रभावित रहते हैं। पिछले 40 वर्ष में बा़ का पानी तीन गुना ब़ा है। देश के प्रमुख 36 शहरों में वायु प्रदुषण के कारण 2 करोड़ लोग बिमारी के शिकार हो रहे है। देश की गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदियों की सफाई के सारे प्रयास विफल हो चुके है क्योंकि कानून होने के बावजूद उद्योगों का 5 मिलियन लीटर दूषित पानी नदियों में जा रहा है।

           आज समग्र विश्व पर्यावरण के संकट से चितिंत है। कई वर्षो से राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में चिताएँ व्यक्त की जा रही है लेकिन परिणाम सकारात्मक के बदले नकारात्मक हो रहा है। समस्या लगातर ब़ते हुए विकराल स्वरूप ले रही है। समस्या का मूल वर्तमान की व्यवस्था एवं लोगों की सोच का परिणाम है। जीवन जीने की दृष्टि में जब तक परिवर्तन नहीं होगा तब तक समस्या का समाधान संभव नहीं है। अ.भा. कार्यकारी मंडल का मानना है कि प्रकृति को भोग का साधन मानकर शोषण की प्रवृति चलती रहेगी तब तक समस्या का सामधान असंभव है। पृथ्वी आवश्यकताएँ पूर्ण करती है लालच को पूर्ण नहीं कर सकती।

            कार्यकारी मंडल का यह स्पष्ट मत है कि सृष्टि चक्र परिस्थति के संतुलन की धुरी है। परिस्थिति के अंतर्गत रहने वाले जीवमनुष्य-पर्यावरण में संतुलन, एकात्मभाव आवश्यक है। इस हेतु पंच महाभूत (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश) की पूजा का भाव। पृथ्वी हमारे भोग के लिये नहीं पृथ्वी हमारी माता है। जल, जमीन, जंगल एवं जानवर का संरक्षण, पर्यावरण के यह सारे तत्व परमपिता परमेश्वर की सृष्टि है यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण है। अपने देश में भी जब तक ॔॔त्येन त्यक्तेन भूजिताः’’ यह दृष्टिकोण में समाज में व्याप्त था तब तक पर्यावरण का संकट नहीं आया। लेकिन जैसे2 यह दृष्टि कम होती गई वैसे पर्यावरण का संकट ब़ता गया।

           पर्यावरण की इन समस्याओं के समाधान हेतु समाज के दृष्टिकोण के परिवर्तन के साथ2 कुछ ठोस कदम उठाने होगें।

  • जलसंग्रह एवं प्रबंधन की योजना।
  • भूमि संरक्षण (जैविक खेती, खाद्य का आग्रह, पंचगव्य का उपयोग)
  • वन प्रबंधन नीति जीव जंतु जानवर का संरक्षण।
  • वैकल्पिक ऊर्जा व्यवस्था का विकास एवं विभिन्न वस्तुओं के रिसाईकलिंग की व्यवस्था बने।
  • प्लास्टिक बैंग (उपयोग करो और फेकने वाली) प्लास्टिक अन्य बनावट इत्यादि पर सम्पूर्ण प्रतिबंध लगे।
  • नदी को दूषित करने वाले उद्योगों के दूषित पानी आदि पर कड़ाई से कदम उठाये जाए।
  • हिमालय के पर्यावरण की रक्षा हेतु ठोस कदम उठाये जाएँ।
  • 5 सितम्बर को पर्यावरण दिवस घोषित किया जाए।

             अ.भा. कार्यकारी मंडल का मानना है कि पर्यावरण के इस वैश्विक संकट से निपटने हेतु व्यक्ति से लेकर वैश्विक स्तर पर प्रमाणिक प्रयास की आवश्यकता है। मात्र दोषारोपण एवं सम्मेलनों तक प्रयास सीमित न रहे। अभीअभी जी20 के सम्मेलन में विकसित देशों ने पर्यावरण पर चिंता तो व्यक्त की लेकिन भारत तथा चीन ने ही गैस उत्सर्जन पर नियंत्रण करने की प्रतिबद्वता जाहिर की, मात्र कानून भी इस समस्या का समाधान नहीं है। समस्या के समाधान हेतु सभी स्तर पर प्रथम पुरूषार्थ विचार आवश्यक।

               अ.भा. कार्यकारी मंडल देश की जनता एवं स्थानीय पंचायत से लेकर राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के शासकों से आह्वान करता है कि पर्यावरण के इस महासंकट के समाधान हेतु व्यक्ति, परिवार, संस्था, समाज एवं राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सामूहिक एवं समग्रता से ठोस प्रयास एवं जनजन का जागरण यही समस्या के समाधान की दिशा में ले जायेगा।

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