भारतीय शिक्षा
मनुष्य में जो संपूर्णता सुप्त रूप से विद्यमान है उसे प्रत्यक्ष करना ही शिक्षा का कार्य है। स्वामी विवेकानन्द                      There are no misfit Children, there are misfit schools, misfit test and studies and misfit examination. F.Burk                     शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य आंतरिक शक्तियों को विकसित एवं अनुशासित करने का है। डॉ. राधा कृष्णन                      ज्ञान प्राप्ति का एक ही मार्ग है जिसका नाम है, एकाग्रता और शिक्षा का सार है मन को एकाग्र करना। श्री माँ

देश की शिक्षा में नये विकल्प हेतु योजना एवं प्रयास

देश की शिक्षा में नये विकल्प हेतु योजना एवं प्रयास

देश की स्वतन्त्रता को 62 वर्षो के बाद आज भी देश में चर्चा जारी है कि देश की दिशा कैसी हो? स्वतन्त्रत भारत में सरकार द्वारा कई आयोग समितियाँ गठित की गई,

उन्होंने कई अच्छे सझाव भी दिये। लेकिन राजनीति इच्छा शक्ति के अभाव में इन अच्छे सुझावों को क्रियान्वयन नहीं किया गया।

आज सकारात्मक परिवर्तन की बात तो दूर लेकिन विभिन्न स्तर के शिक्षा के पाठयक्रम में भयानक विकृतियाँ एवं विसंगतियाँ भरी पड़ी है। पाठयक्रम में व्याप्त विकृतियाँ एवं विसंगतियाँ भरी पड़ी है। पाठयक्रम में व्याप्त विकृतियाँ एवं विसंगतियों के विरूध्द विगत 51 वर्षों में कई प्रकार के आन्दोलन करते हुए उसमें सुधार करने में सफलता प्राप्त की है। लेकिन अभी बहुत कुछ करना शेष है।

इसलिए शिक्षा में समग्र परिवर्तन हेतु शिक्षा बचाओ आन्दोलन एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के माध्यम से निम्न प्रयास शुरू किए है।

  • शिक्षा में विकृतियाँ, विसंगतियाँ को सुधार करने का प्रयास।
  • शिक्षा हेतु नये विकल्प का प्रयास।

शिक्षा के पाठयक्रम में विकृतियाँ, विसंगतियाँ यह कोई नया विषय नहीं है। जब से अंग्रेजो के राज में मैकॉले द्वारा जो शिक्षा व्यवस्था बदल करके देश की शिक्षा को अभारतीय एवं यहां की देश, संस्कृति, महापुरूष एवं देवी-देवताओं को अपमानित करके भारत की छवि को धुमिल करते विश्व में स्थापित किया है उसी दिशा में आज भी देश में एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक साजिश के तहत प्रयास किए जा रहे हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए.भाग-2(आनर्स) की इतिहास की पुस्तक में”थ्री हैन्ड रामायण विद फाईव एक्जापल को पाठयक्रम में सम्मिलत किया गया है जिसमें माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान जी को विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेख के पीछे कहानी यह है कि जब 91-92 में रामायण सीरियल देश में काफी प्रचलित हुई थी। उस समय इग्लैण्ड की ऑक्सफोड विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाली महिला पोला रीचमैन को कष्ट हो गया। इसके बाद पौलारीच मैन एवं रोमिला थापर मिलते है और चर्चा करते है कि एक ही रामयाण (वाल्मीकी रामायण) प्रचलित होगी तब बाकी रामायणों का क्या होगा। यह सोच कर उन्होंने ”मैनी रामायण” किताब लिखा जिसमें एक लेख ”थी्र हैण्डेड रामायण विद फाईव एसाम्पल” सम्मिलित है। इस प्रकार की एक और ”वेन्डी डोनिगर” (अमेरिकी निवासी) ने ” द हिन्दूज-एल्टरनेटिव हिस्ट्री” किताब में भयानक विकृत सामग्री लिखी गयी है। जिसके विरूध्द भारत एवं अमेरिका में आन्दोलन शुरू किया गया है। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका में आन्दोलन शुरू किया गया है। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका मे वेण्डी डोनिगर को दिये जाने वाले सम्मान को रोका गया है। इसी प्रकार शिक्षा बचाओ आन्दोलन के द्वारा एन.सी.ई.आर.टी की इतिहास की पुस्तकों के विरूध्द में 31 वर्ष के आन्दोलन के बाद दिनांक 31 जनवरी 2009 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने 51 विकृत पैरे हटाने का आदेश दिया। लेकिन इसके बाद आयी नई पुस्तकें कक्षा 8 वी की पुस्तक में सच्चर कमेटी को पढ़ाया जारहा है। तुलसीदास के जन्मस्थान के सन्दर्भ में विवादास्पद उल्लेख आदि विकृत सामग्री डाली गई है। हम जानते है और वह बात पुन: प्रस्तावित भी हो रही है कि भारत एक महान राष्ट्र था, यहां की परम्परा, व्यवस्था, संस्कृति आदि श्रेष्ठ था। इस दिशा में उभरते भारत को गलत बताने का जो प्रयास राष्ट्रीय, अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर किये जा रहे है। उसको परास्त करने हेतु शिक्षा बचाओ आन्दोलन सफलतापूर्वक प्रयासरत है।

शिक्षा में नये विकल्प हेतु प्रयास:-

यूनेस्कों की डेलर्स समिति ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि किसी भी देश की शिक्षा उस देश की संस्कृति एवं विकास के अनुरूप होनी चाहिए। क्या? आज अपने देश की शिक्षा अपने देश के अनुरूप है क्या? उत्तार स्वाभाविक नकारात्मक है। शिक्षा यानी विद्यार्थी के व्यक्तित्व के समग्र विकास तथा चरित्र निर्माण कर सके एंव देश की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके यही शिक्षा का लक्ष्य है। शिक्षा की हमारी मूलभूत संकल्पना यह शाश्वत सत्य है। इस को आधार बनाकर आधूनिकता की आवश्यकता एवं भविष्य की दृष्टि को ध्यान मे रखकर वह कार्य देशव्यापी करने की आवश्यकता है। इस दिशा में शिक्षा बचाओ आन्दोलन एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के द्वारा जो प्रयास किए जा रहे है वह यहाँ
प्रस्तुत है।

2007 में देश में यौन शिक्षा लागु करने का प्रयास केद्र सरकार के द्वारा किया गया था। इस प्रयास में देश की अनेक संस्थाए जुड़ी  इसके परिणामस्वरूप सरकार ने अपना निर्णय स्थगित किया। उस पाठयक्रम की समीक्षा हेतु कुछ राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार के द्वारा वैकल्पिक पाठयक्रम हेतु समितियाँ गठित की गई। जब आन्दोलन चल रहा था उसी समय अपने माध्यम से राज्यसभा की याचिक समिति को एक याचिका दी गई थी। समिति ने याचिका को स्वीकार करते हुए उस पर देश के सात बड़े महानगरों में सुनवाई को जिसमें उनकी 40 हजार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए। इन आवेदनों की जब समीक्षा की गई तब अधिकतर आवेदन यौन शिक्षा के विरूध्द में थे। याचिका समिति ने लगभग डेढ़ वर्ष कार्य करते हुए अपना रिपार्ट तैयार किया। जिस रिपोर्ट पर देश के उपराष्ट्रपति ने भी हस्ताक्षर किए। बाद में उस रिपोर्ट को राज्यसभा में भी किया। पेटिशन कमेटी में सम्मिलत कई पक्षों के सांसदों ने  देने की सर्वसम्मति से पारित रिपोर्ट में कहा गया की यौन शिक्षा के बदले ”चरित्र निमार्ण एवं व्यक्तितव के विकास की शिक्षा” देनी चाहिए। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने भी यौन शिक्षा के विकल्प देने हेतु सोचा और दिनांक 21, 22 फरवरी 2009 को पूणे में राष्ट्रीय स्तर का परिसंवाद आयोजित किया। इस परिसंवाद में देशभर से आए विध्दानों ने सर्वसम्मति से एक प्रारूप तैयार किया। एक पाठयक्रम समिति का गठन भी किया। पाठयक्रम समिति ने चार मास कार्य करके याचिका समिति के सुझाव के अनुसार ”चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास” का पाठयक्रम तैयार किया। उस पाठयक्रम पर चर्चा हेतु देश में सात परिसंवादों कर आयोजन किया गया। इन परिसंवादों में छात्र, शिक्षक, शिक्षाविद् विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं के प्रतिनिधि सहभागी हुए। परिसंवाद ने ……. प्रतिभागी पाठयक्रम की पुस्तक पढ़कर सुझाव लेकर आना सहभागी हुए। सातों परिसंवादों के सुझाव पर विचार हतु पुन: पाठयक्रम समिति की बैठक हुई। परिवर्तित पाठयक्रम तैयार किया गया है। जिसका शीषर्क ”विद्यालय गतिविधियों का आलय” पाठयक्रम शिक्षकों के लिये होगा। छात्रों हेतु इस पाठयक्रम के आधार पर एक कार्यक्रम तैयार किया है। वर्तमान विद्यालय की व्यवस्था में ही उस कार्यक्रम को जोड़ना है। कोई अलग से पुस्तक या उस हेतु  कालांश छात्रों हेतु नहीं रहेगा। इस कार्यक्रम को प्रायोगिक तौर पर 50 विद्यालयों में लागू करने के लिये दिनांक 16 सें 18 अप्रैल उस विद्यालय के प्रधानाचार्यो हेतु एक कार्यशाला का आयोजन गया है। दूसरी ओर राज्य सरकारे इस पाठयक्रम का पूर्णरूप से स्वीकार नहीं कर रही लेकिन पंजाब, हिमाचल, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश की राज्य सरकारों ने यौन शिक्षा के बदले योग शिक्षा लागु करने का निर्णय किया है। उतर प्रदेश सरकार ने यौन शिक्षा के बदले स्वास्थ्य की शिक्षा की घोषणा की है। योग, स्वास्थ्य यह सभी अपने नये पाठयक्रम का हिस्सा है।

उपरोक्त प्रवास की दिशा में अन्य पांच विषयों पर कार्य की योजना भी बनी है।

1. मूल्य शिक्षा     2. वैदिक गणित   3. पर्यावरण की शिक्षा

4. मातृभाषा में शिक्षा   5. शिक्षा स्वायत्ता हो। इन विषयों पर हुए कार्य की जानकारी निम्नािšत है।

मूल्य शिक्षा :-

अभी तक हरिद्वार, कर्णावती (अमदाबाद) तथा ग्वालियर में परिसंवाद आयोजित हुए है। यह विषय ऐसा है जिस पर साधारणत: शिक्षा जगत में आम सहमती है। निजी स्तर पर कई संस्थाए इस विषय को अपने विद्यालयों में पढ़ाती है। ऐसी सभी संस्थाओं को इस माध्यम से एक मंच पर लाया जा सकता है। इस दिशा में चल रहे अन्य प्रयासों जैसे सत्य साई इन्टरनेशनल के द्वारा मूल्य शिक्षा पर कार्य करने वाली संस्थाओं को जोड़ते हुए विगत दिसम्बर मास में एक राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया था, जिसमें शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की सहभागिता रही। इस प्रयास को आगे बढ़ाने हेतु उन्होंने एक एक्सन गुप्र बनाया है जिसमें न्यास के सचिव अतुल कोठारी को उन्होंने निमन्त्रित किया है।

आगामी दिनों में अपने द्वारा इस विषय के पाठयक्रम बनाने हेतु भी प्रयास की सोच बनी है। विषयों के अनुसार उदाहरण इंजीनियरिंग शिक्षा में मूल्य आदि परिसंवाद आयोजित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। मूल्य शिक्षा शोध केन्द्र स्थापित करने की भी योजना है।

पर्यावरण शिक्षा –

आज ‘ग्लोबल वार्मिग” जिस को कहा जा रहा है। इन सारी समस्याओं का समाधान भारतीय चिन्तन में है। हमारे सारे प्राचीन, धर्मो के ग्रन्थों में इसका उल्लेख है। देश में उच्चतम न्यायालय के निर्देश के अनुसार विद्यालयों में पर्यावरण का पाठयक्रम जोड़ा गया है, लेकिन उसकी डाक योजना, व्यवस्था, पाठयक्रम नहीं है। इस हेतु अपने द्वारा भारतीय चिन्तन के आधार पर पाठयक्रम तैयार हो इसका विचार चल रहा है।

वैदिक गणित :-

;वैदिक गणित

स्थान

दिनांक

सहभागी

प्रान्त

संख्या

सहयोगी संस्था

अतिथि

1

नागपुर

30, 31 जनवरी  2010

1

122

हिस्लोप कॉलेज,

नागपुर विश्वविद्यालय वैदिक गणित टीचर एसोसिएशन,

कनिस्था महाविद्यालय गणित शिक्षक कल्याण परिषद्

डॉ. दीप्ती क्रिश्चयन,

प्राचार्य हिसलोप कॉलेज, नागपुर

2

जयपुर

13, 14 फरवरी 2010

6

155

जे.ई.सी.आर. सी फाउण्डेशन

जयपुर

डॉ. दामोदर जी

(पूर्व कुलपति तकनीकी वि.वि.कोटा

राजस्थान)

3

बिलासपुर

25, 26 फरवरी 2010

5

86

डॉ. सी. वी. रमन विश्वविद्यालय

श्री वृजमोहन अग्रवाल,

शिक्षा मंत्री, बिलासपुर

श्री रमेश चन्द्र शर्मा, (आई. जी. बिलासपुर)

4

हैदराबाद

20, 21 मार्च 2010

4

125

केशव मेमोरियल इन्स्ट्रीटयूट आफ ट्रेकनोलोजी

चैतन्य भारती, हैदराबाद

इन्स्ट्रीटयूटर आफ रिसर्च आन वेदाज

श्री कुप्पा वैकटा कृष्णमूर्ति

चैयरमेन (आई सर्वे)

प्रो. वी. केनन

(वाईस चांसलर, सैन्ट्रल वि.वि.)

5

वाराणासी

20, 21 मार्च 2010

4

55

ज्योतिष विभाग, वेद विभाग, विज्ञान भारती तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

श्री नरेन्द्र पुरी, (आई.आई.टी रूडकी)

प्रो.श्री बी.डी. सिंह

(रेक्टर काशी हिन्दू वि.वि. हैदराबाद)

6

राठ(उ.प्र.)

6, 7 फरवरी

2010

स्थानीय

350

बी. एन. पी. कॉलेज राठ

मित्तल इन्टरप्राईजेज, दिल्ली

नूपूर इन्टरप्राईजेज बान्दा

डॉ. के. बी. वर्मा

प्राचार्य, बी. एन. पी. कॉलेज राठ

(उत्तर प्रदेश)

आगामी योजना के अन्तर्गत भोपाल में एक वैदिक गणित शोध संस्थान स्थापित करने की योजना हैं। उस संस्थान के द्वारा चार प्रकार के कार्य करने की योजना है।

  • कक्षा 1 से 12 तक का समग्रता से पाठयक्रम तैयार करना।
  • उच्च शिक्षा में वैदिक गणित का समावेश।
  • संगणक एवं वैदिक गणित।
  • प्रतियोगी परिक्षा में वैदिक गणित का उपयोग।

इसके उपरोक्त जहां परिसंवाद हुए है वहां नियमित कार्य शुरू करने का प्रयास किया जा रहा हैं। छात्रों को शिक्षण देने ेने एवं शिक्षकों के प्रशिक्षण की भी योजना बने इसका प्रयास है।

मातृभाषा में शिक्षा :-

विश्व का शायद ही कोई देश होगा जहां प्राथमिक शिक्षा विदेशी भाषा में पढ़ाई जा रही हो। विज्ञान एवं तर्क के आधार पर तो यह बात सर्वमान्य है कि शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। देश से अंग्रेज गए अंग्रेजीयत नहीं गई इस बात का यह प्रमाण है कि सामान्य व्यक्ति से लेकर अधिकतर विद्वान लोगों में यह भ्रम इतना दृढ़ है की बिना अंग्र्रेजी देश का एवं व्यक्ति का विकास सम्भव नहीं है, इसलिए भाषा की लड़ाई बहुत व्यापक स्तर पर लडनी होगी। देश की समग्र शिक्षा को बदलने के लिए जितना प्रयास करना पड़ेगा उससे भी अधिक प्रयास अपनी भाषाओं की पुन: स्थापना हेतु करना पड़ेगा। इस विषय सम्बन्ध में सम्पर्क कार्य जारी है। व्यक्तिगत जीवन में अपनी भाषा के प्रयास शुरू किए है जैसे :-

1. हस्ताक्षर अपनी भाषा में करना।

2. अंग्रेजी मे भी बोलना पड़े या लिखना पड़े तो भी इन्डिया नहीं भारत का ही प्रयोग करे।

3. अपने सारे कार्यक्रम अपनी ही भाषाओं में संचालित किये जाए।

प्रयास शुरु किए है इस हेतु राष्ट्रीय स्तर पर स्वायत्ता शिक्षा संस्थान की स्थापना होनी चाहिए। यह संस्थान पूर्ण रुप से स्वयत्ता हो। जैसे न्यायालय या चुनाव आयोग की सारी व्यवस्था सरकार करती है। लेकिन वही न्यायालयों ने अनेक निर्णय सरकार के विरूध्द दिये है। हमारा मानना है कि चुनाव आयोग, न्यायालय से भी अधिक स्वायत्ताता शिखा को देनी चाहिए। स्वायत्ता शिक्षा संस्थान की रचना जिला स्तर तक होनी चाहिए। इसका एक प्रारूप बनाकर देशव्यापी चर्चा का प्रयास शुरू किया है।

आगामी दिनों में शिक्षा सम्बन्धित और कुछ विषयों पर भी कार्य शुरू होगा।

जनजागरण के प्रयास :-

1. परिचर्चा, परिसंवाद, गोष्ठियों का आयोजन :-

शिक्षा के विभिन्न विषयों पर इस प्रकार के कार्यक्रम का आयोजन लगातार किया  जा रहा है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से देश के नागरिकों में शिक्षा के प्रति जागरूता लाने का प्रयास जारी है। इससे समाज में यह प्रस्थापित होना है कि शिक्षा मात्र सरकार या कुछ संस्थाओं का विषय नहीं है। यह वषिय सम्पूर्ण समाज का  है। साथ ही शिक्षा से जुड़े सभी प्रकार के लोगों का शिक्षा में नये विकल्प की चर्चा-चिन्तन में सहभागी करने से वास्तविक देश की जनता क्या चाहती है यह भी समाज, सरकार के समक्ष उभकर आयेगा। पिछले 1500-2000 वर्षो से अपने देश में चिन्तन प्रक्रिया रूक गई है। इस चिन्तन प्रकिया को पुन: शुरू करने का प्रयास है। अन्यथा जैसे यौन शिक्षा का पाठयक्रम युनीसेफ के द्वारा आया वह यथावत लागु कर दिया गया। विभिन्न प्रकार के प्रबन्धन का पाठयक्रम विदेशों से आ रहे है वह भी यथावत लागु किये जा रहे है। वास्तव में चिंतन की आवश्यकता है कि अपने देश में किस प्रकार का प्रबन्धन का पाठयक्रम आवश्यक है। विदेश की कुछ अच्छी बाते है उसको अवश्य जोड़ सकते है लेकिन अन्धाअनुकरण बन्द होना चाहिए।

साहित्य प्रकाशन :-

शिक्षा सम्बन्धित विषयों पर लाखों की संख्या में विभिन्न भाषाओं में पत्रक छपवाकर समाज तक पहुँचाने का प्रयास हो रहा है। साथ ही अभी तक अपने द्वारा 50 पुस्तकें प्रकाशित की गई है। जो 6000 विद्वानों को नियमित भेजी जा रही है आगामी वर्ष में 10 हजार की योजना है। इसके अतिरिक्त भी अन्य कई पुस्तकों का प्रकाशन शुरू किया है।

समाचार माध्यम :-

वर्तमान युग में समाचार माध्यमों के अत्याधिक महत्तव है। अपने द्वारा स्थान-स्थान पर पत्रकार वार्ता, प्रैस वक्तव्य प्रकाशित करना। शिक्षा सम्बन्धित लेख अपने कार्यकर्ता लिखे तथा समाचार माध्यमों में वह छपे इसका भी प्रयास आवश्यक हैं अच्छे लेखको अपना साहित्य देना वह शिक्षा पर लेख लिखे इसका प्रयास करना। सम्पादकों तथा पत्रकारों का सम्पर्क करना। विभिन्न साप्ताहिक, पाक्षिको, मासिक में भी अपना समाचार भेजना। विभिन्न चैनलो का भी इस कार्य में सहयोग प्राप्त करना।

उपरोक्त सारे प्रयासों को योग्य दिशा में आगे बढ़ाने और शिक्षा पर समाजव्यापी जागरण हो इस  हेतु निम्नािšत बाते भी अति आवश्यक है।

1-   शिक्षा शास्त्री, शिक्षाविदों का व्यापक सम्पर्क अभियान चलाते हुए विषय के अनुसार उनकी सूची तैयार करना।

2-  विभिन्न विषयों के शोध केन्द्र स्थापित हो जिसमें उन विषय के अपने शाश्वत सिध्दान्त के आधार पर आधुनिक आवश्यकता के अनुसार नये पाठयक्रम पाठय-पुस्तकें तैयार करना।

कुछ शोध केन्द्र हम स्थापित कर सकते है लेकिन अन्य सामाजिक शैक्षिक संस्थाए इस प्रकार के केन्द्र स्थापित करे इसका भी प्रयास करना। प्रत्येक राज्य में कम से कम एक विषय पर शोध कार्य शुरू हो जिसमें कार्य अखिल भारतीय स्तर का हो।

3-  अपने द्वारा विषयों के अनुसार एक संयोजक तथा समिति का गठन करना।

4-  शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत सामाजिक, आध्यात्मिक एवं शैक्षिक संस्थाओं से सम्बन्ध स्थापित करना। अपने द्वारा हो रहे परिसंवादों का आयोजन ऐसी विभिन्न संस्थाओं के संयुक्त तत्वाधान में किए जा रहे है। आगे के दिनों में इस प्रकार की संस्थाओं का एक अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित करना चाहिए इस प्रकार का विचार है।

5-  देश के प्रत्येक विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालयों में शिक्षा के चिन्तन की प्रकिया शुरू हो। अन्यथा आज बहुत कम संस्थाओं में यह प्रयास किये जा रहे है।

6-  शिक्षा के विभिन्न विषयों पर कार्यरत राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की अनेक ऐसोशिएशन तथा संस्थाएं है उसके साथ सम्पर्क, सम्बन्ध बढ़ाना तथा अपने कार्यकर्ता भी उसमें सहभागी होकर वहां चलने वाले परिसंवाद, परिचर्चा में शोध पत्र प्रस्तुत करें। धीरे-धीरे से इन संस्थाओं में भारतीय चिन्तन के आधार पर शिक्षा के उन विषयों का चिन्तन शुरू हो।

7-  राज्यों एवं केन्द्र सरकार के शिक्षा मंत्री, सचिव तथा अन्य अधिकारियों से हमारे नियमित सम्पर्क बने। वहां चल रहे विषयों हो रहे निर्णयों की आवश्यक जानकारी प्राप्त हो सके, वहां की निर्णय प्रक्रिया पर भी हम प्रभाव डाल सकें। इसका भी प्रयास आवश्यक है। इसी प्रकार शिक्षा के राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों के केन्द्रों में भी सम्पर्क स्थापित करना।

8-  विभिन्न राजनैतिक पक्षों के पदाधिकारी एवं सांसदो, विधायको से भी सम्पर्क आवश्यक है। धीरे-धीरे पक्ष की रेख से पर शिक्षा के हित में सर्वसम्मति बने इस दिशा में प्रयास करना।

9-  हम शिक्षा में नया विकल्प दे सके इस हेतु अपने शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत सभी संगठनों ने मिलकर एक योजना तैयार करना। इस दिशा में सामूहिक एवं संगठन सह प्रयास की भी योजना बने। जिससे आगे के पाचं वर्षो में कुछ ठोस परिवर्तन दिखाने की स्थिति में हम आ सके।

–अतुल कोठारी

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