भारतीय शिक्षा
मनुष्य में जो संपूर्णता सुप्त रूप से विद्यमान है उसे प्रत्यक्ष करना ही शिक्षा का कार्य है। स्वामी विवेकानन्द                      There are no misfit Children, there are misfit schools, misfit test and studies and misfit examination. F.Burk                     शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य आंतरिक शक्तियों को विकसित एवं अनुशासित करने का है। डॉ. राधा कृष्णन                      ज्ञान प्राप्ति का एक ही मार्ग है जिसका नाम है, एकाग्रता और शिक्षा का सार है मन को एकाग्र करना। श्री माँ

पर्यावरण अध्ययन एवं शोध केन्द्र

पर्यावरण अध्ययन एवं शोध केन्द्र

उद्देश्य

पर्यावरण शब्द एवं उसका अर्थ अत्यन्त व्यापक है, जिसमें सारा ब्रह्माण्ड ही समा जाता है। परि-अर्थात् हमारे चारों ओर का, आवरण-अर्थात् ढ़कना ही पर्यावरण है। हम सभी एवं हमारा यह संसार-‘आकाश, वायु, जल, पृथिवी, अग्नि (सूर्य) तथा वन, वृक्ष, नदी, पहाड़, समुद्र एवं पशु-पक्षी’ आदि से आवृत है, ढका है। उपर्युक्त समस्त तत्तवों तथा पदार्थों का समग्र रूप अथवा समुदित रूप जो पर्यावरण है, उसी में सब पैदा होते हैं, जीवित रहते हैं, साँस लेते हैं, फलते-फूलते हैं और अपने समस्त कार्यकलाप करते हैं। अत: अपने और अपने समस्त समाज के लिए पर्यावरण का संरक्षण व पोषण नितान्त आवश्यक है।

आज पर्यावरण का प्रदूषण और निरन्तर उसका क्षय हो रहा है। जल-वायु प्रदूषित हैं। ग्लेशियर का पिघलना, ग्लोबल वार्मिंग तथा ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन से ओजोन छतरी में छेद के कारण विश्व के नेता, वैज्ञानिक तथा विचारवान् व्यक्ति चिन्तित हैं,-जिस पर विचार करने के लिए विश्व सम्मेलन व संगोष्ठियाँ हो रही हैं। किन्तु हमारे भारत के चिरन्तन ऋषि-मुनि, आचार्य, मनीषी व कविगण आरम्भ से ही पर्यावरण संरक्षण के प्रति सचेत थे। समस्त वैदिक साहित्य एवं लौकिक साहित्य में उपर्युक्त आकाश-वायु-जल तथा पृथिवी आदि पर्यावरण के घटक तत्तवों का स्तवन, उनकी विशेषताओं तथा विश्व के लिए उनकी उपयोगिताओं का चित्रण है। इतना ही नहीं-वैदिक सूक्तों में पर्यावरण के संरक्षक व पोषक उपर्युक्त समस्त प्राकृतिक तत्तवों को साक्षात् देवता मानकर उनकी प्रशस्ति का गौरवगान किया गया है। जब हम वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसे वैदिक सूक्तों एवं मन्त्रों का चिन्तन और विश्लेषण करते हैं तो हमें पर्यावरण से सम्बध्द अनेक वैज्ञानिक रहस्यों की उपलब्धि होती है।

उल्लेखनीय है कि आज के वैज्ञानिक, भौतिक पर्यावरण के विषय में ही चिन्तन तथा वैज्ञानिक अन्वेषण का प्रयास कर रहे हैं। किन्तु भौतिक पर्यावरण के शुध्द हो जाने

पर  भी यदि मानव के मन-बुध्दि व आत्मा शुध्द न हुए और उनके अन्दर राग-द्वेष, छल-छिद्र व काम-क्रोध, ईष्या आदि ज्वालाएँ जलती रहीं तो विश्व में शान्ति की स्थापना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अत: भारत के मनीषियों व चिन्तकों ने भौतिक पर्यावरण के साथ-साथ मानव के आध्यात्मिक पर्यावरण की शुध्दि पर जोर दिया था, जिसकी अभिव्यक्ति – तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु”- ”धियो यो न: प्रयोदयात्।तथा चरित्रान्स्ते शुन्धामिआदि वैदिक मन्त्रवाक्यों द्वारा होती है।

उपर्युक्त के परिप्रेक्ष्य में आज पर्यावरण विषयक अध्ययन तथा शोध की बहुत आवश्यकता है- जिसके अन्तर्गत वेदादि शास्त्र व भारत के प्राचीन साहित्य को आधार मानकर और उसके साथ आधुनिक पर्यावरणविद् तथा वैज्ञानिकों के निष्कर्षो का सामान्जस्य स्थापित करके पर्यावरण के शोधन, रक्षण व पोषण के सार्थक उपायों का अन्वेषण किया जाय। इस महत्वपूर्ण उद्देश्य के लिए एक ‘पर्यावरण अध्ययन एवं शोधकेन्द्रकी स्थापना अत्यन्त आवश्यक तथा प्रासांगिक है।

कार्य योजना।

  • पर्यावरण दैनिक जीवन व्यवहार में
  • हमारे पूराने ग्रंथो में पर्यावरण संबधी सामग्री का अध्ययन करके उनका वर्तमान पर्यावरण की वैश्वीक समस्याओं के सामधारन हेतु क्रियान्वयन की योजना।
  • शोध कार्य
  • इस हेतु समय-2 पर बैठके, कार्यशाला, परिसंवाद, परिचर्चा, संगोष्ठी का आयोजन।
  • साहित्य सृजन करके  प्रकाशित करना।
  • डाक्यूमेन्टेशन
  • पर्यावरण संम्बधित देशभर की संस्थाओ को एक मंच पर लाना, संकलन, समन्वय सामजस्य स्थापित करना। आगे अर्तराष्ट्रीय स्तर पर भी इसी प्रकार प्रयास करना।
  • पर्यावरण सम्बन्धित स्थानीय से लेकर वैश्वीक समस्या के समाधान हेतु कार्य।
  • पाठयक्रम तैयार करना – सरकारी, निजी स्तर पर लागु हो इसका प्रयास।

व्यवस्थाएँ

1-   स्थान चयन

2-  भवन (केन्द्रिय कार्यालय)

3-  दृश्य, श्रव्य उपकरणों की व्यवस्था, उपयोग

4-  योजना के सहकारीजन

मानव संसाधन

1-   कार्यालय प्रमुख तथा कार्यालय सहायक

2-  हिन्दी तथा अंग्रेजी का टाईपिस्ट

3-  शुरू में एक शोधार्थी

4-  पर्यावरण के विद्वानों के मार्गदर्शन हेतु एक समिति, एक व्यवस्थापक समिति

5-  देश के वर्तमान में प्रचलित पर्यावरण अध्ययन व शोधकेन्द्रों की सूची

6-  पर्यावरण पर कार्य करने वाले प्रमुख विद्वान लेखक, प्रोफेसर तथा वैज्ञानिकों की सूची।

7-  पर्यावरण सम्बन्धी साहित्य – ग्रन्थ, सम्पादित पत्र-पत्रिकाएं आदि।

8-  पर्यावरण पुस्तकालय हेतु पुस्तक चयन ( सूची)

9-  पर्यावरण अध्ययन एवं शोध के प्रमुख विषय –

  • · वैदिक संहिताओं में पर्यावरण के मूल सा्रेत
  • · उपनिषद् साहित्य में पर्यावरण के तत्व
  • · वेदांगों में पर्यावरण विषयक संकेत
  • · स्मृति एवं धर्मशास्त्रों में पर्यावरण संरक्षण।
  • · वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में पर्यावरण चेतना।
  • · संस्कृत साहित्य में पर्यावरण।
  • · वैदिक एवं संस्कृत साहित्य में वृक्ष तथा लताएँ।
  • · प्राचीन भारतीय साहित्य में पशु-पक्षी एवं पर्यावरण के सहायक जीव-जन्तु
  • · प्रकृति एवं पर्यावरण
  • · वन-वृक्ष-पर्वत-समुद्र-नदी व जलाशयों का पर्यावरण में योगदान।
  • · पर्यावरण प्रदूषण (कारण एवं निवारण)
  • · पर्यावरण एवं परिस्थिति
  • · पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण निवारण के वैदिग उपाय-यज्ञ, वृक्षारोपण, जल संरक्षण आदि।
  • · पंचतत्व (भूमि-जल-अग्नि-पायु-अंतरिक्ष) का वैज्ञानिक विश्लेषण पर्यावरण के प्ररिपेक्ष्य में।
  • · पौराणिक साहित्य में पर्यावरण चेतना।
  • · वैदिक एवं संस्कृत साहित्य में मानसिक पर्यावरण।
  • · हिन्दी साहित्य में पर्यावरण।
  • · रसायन शास्त्र एवं पर्यावरण।
  • · आधुनिक विज्ञान एवं पर्यावरण।
  • · पर्यावरण एवं वास्तुशास्त्र।
  • · वर्तमान पर्यावरण सम्बन्धित वैश्विक समस्या के कारण एवं उपाय।
  • · पर्यावरण रक्षा हेतु कार्य करनेवाले आधुनिक महापुरूषों का तुलानात्मक अध्ययन (भारत में तथा वैश्विक स्तर पर)

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One thought on “पर्यावरण अध्ययन एवं शोध केन्द्र

  1. Dr. Yatish Jain

    Dear Atul ji,
    On 13th April, we discuss about the environmental approach in daily life and how we propagate it through school. It is also very necessary to evaluate the curricula of different environmental courses. There is need of long and sustainable approach and must be related to local environment.

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