भारतीय शिक्षा
मनुष्य में जो संपूर्णता सुप्त रूप से विद्यमान है उसे प्रत्यक्ष करना ही शिक्षा का कार्य है। स्वामी विवेकानन्द                      There are no misfit Children, there are misfit schools, misfit test and studies and misfit examination. F.Burk                     शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य आंतरिक शक्तियों को विकसित एवं अनुशासित करने का है। डॉ. राधा कृष्णन                      ज्ञान प्राप्ति का एक ही मार्ग है जिसका नाम है, एकाग्रता और शिक्षा का सार है मन को एकाग्र करना। श्री माँ

विधि शिक्षा और न्याय के क्षेत्र में भारतीय भाशा

विधि शिक्षा और न्याय के क्षेत्र में भारतीय भाशा
14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को भारतीय संघ की राजभाशा बनाया गया। यह सौभाग्य का विशय है कि देश की जनभाशा हिन्दी को प्रथम बार देश की राजभाशा के रूप में संवैधानिक मान्यता दी गर्इ। स्वतंत्रता के बाद देश में राज्यों का जो गठन किया गया वह भी भाशा के आधार पर हुआ। 14 प्रमुख भाशाओं को संविधान की 8वीं अनुसूची में स्थान दिया गया जो आज बढ़कर 22 हो गर्इ हैं।
परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि देश की राजभाशा हिन्दी को देश के उच्चतम न्यायालय में मान्यता नहीं है। उसी प्रकार केवल 4 राज्यों को छोड़कर, अन्य किसी भी राज्य की राजभाशा को वहां-2 के उच्च न्यायालय में मान्यता नहीं है। यह वास्तविक लोकतंत्र है क्या? यह प्रश्न उठता है। उन राज्यों की जनभाशा जो राजभाशा भी है, को वहां के उच्च न्यायालय में मान्यता न देना, उनके साथ धोर पक्षपात है। इसका कारण यह है कि वर्श 1963 में पारित राजभाशा अधिनियम में सरकारी कार्यो प्रयोजनों के लिए 26 जनवरी 1965 के बाद भी अंग्रेजी के प्रयोग पहले की तरह किए जाते रहने की छूट दी गर्इ। इसलिए अनुच्छेद-348 के तहत उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के कामकाज की भाशा पहले की तरह अंग्रेजी ही है। इस के द्वितीय परन्तुक में यह व्यवस्था भी की गर्इ है कि राज्य के राज्यपाल महोदय, मा. राश्ट्रपति की सहमति से अपने राज्य के उच्च न्यायालय में अंग्रेजी के साथ हिन्दी या उस राज्य की राजभाशा को वहां की सभी प्रकार की कार्यवाही में प्रयोग किये जाने की अनुमति दे सकते हंै। इसी व्यवस्था के अंतर्गत राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश एवं बिहार के उच्च न्यायालयों में हिन्दी में न्यायिक कार्यवाही की जा रही है। इन्हीं राज्यों से अलग हुए झारखंड, उत्तराखंड एवं छत्तीसगढ़ में इस प्रकार की अनमुति स्वभाविक रूप से होनी चाहिए थी, जोकि नहीं है। राज्य पुनर्गठन कानून के अनुसार, जब एक राज्य में से दो राज्य बनते हंै, तब दोनों में वहां की पुरानी व्यवस्था यथावत रहती है। लेकिन इस विशय में ऐसा न होने का कारण वहां-2 के शासकों, प्रशासकों ने उनके स्वाभाविक अधिकार के लिए जागरूकता नहीं दिखार्इ है। अत: इन नये तीन राज्यों के उच्च न्यायालयों में वहां की राजभाशा को मान्यता नहीं है।
जिस प्रकार उपरोक्त चार राज्यों के उच्च न्यायालयों में वहां की राजभाशा हिन्दी को वहां के उच्च न्यायालयों में मान्यता दी गर्इ है, उसी प्रकार तमिलनाडू, गुजरात, छत्तीसगढ़ ने भी अपनी राज्य की राजभाशा के प्रयोग की छूट हेतु मांग की तो केन्द्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष की राय मांगी और बाद में इन तीनों राज्यों को उत्तर दिया गया कि उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष, इससे सहमत नहीं है। संविधान के अनुसार तो राज्यपाल महोदय मा. राश्ट्रपति की अनुमति से इसको लागू कर सकते है। फिर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीष से क्यों पूछा गया? और उसका बहाना बनाकर केन्द्र सरकार ने इन तीनाें राज्यों को अनुमति न देकर उन तीनों राज्यों के साथ भेदभाव किया है। एक प्रकार से केन्द्र सरकार ने संविधान के प्रावधान का उल्लंधन किया है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय, न्याय व्यवस्था देष के आम नागरिकों को न्यायपूर्ण तरीके से जीने का अधिकार मिले और कहीं किसी के साथ अन्याय होता है, तो उसे न्याय मिले, इस हेतु यह व्यवस्था है। परन्तु हमारे उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों में जिस भाशा में कार्य होता हैं, उसे देश की 97 प्रतिशत जनता नहीं समझ पाती। न्यायालयों में न्यायामूर्ति और अधिवक्ता के बीच क्या बहस हुर्इ, वेे 97 प्रतिशत लोग समझ ही नहीं पाते। जिस भाशा में उनको निर्णय लिखित में दिया जाता है, उसे वह समझ ही नहीं पाते। क्या? देश के तीन प्रतिषत अंग्रेजी जानने वाले लोगों के लिए ही न्याय व्यवस्था है। राज्योंं के उच्च न्यायालयों में वहां की भाशा में कार्य हो उसके विरूद्ध यह तर्क दिया जाता है कि न्यायमूर्तियों का स्थानान्तरण होेने के कारण उनको अन्य राज्यों की भाशा समझने में कठिनार्इ होगी। परन्तु वर्तमान में अधिकतर उच्च न्यायालयों में 10 प्रतिशत भी अन्य भाशा के न्यायाधीष नहीं हंै। सामान्यत: उच्च न्यायालयों में अधिक से अधिक दो-तीन न्यायाधीष अन्य राज्यों के होते हैं। जब वहां की स्थानीय भाशा में बहस होगी, तब उसी राज्य के न्यायधीषों की बेंच हो सकती है। दूसरा जिस प्रकार आज संसद में व्यवस्था है कि कोर्इ भी सदस्य चाहे जिस भाशा में बोले उसे दूसरा सदस्य, अपनी भाशा में सुन सकता हैं। ऐसा अनुवाद की व्यवस्था से होता है। देश के 24 उच्च न्यायालयों में भी इसी प्रकार की अनुवाद की व्यवस्था की जा सकती है। प्रषासनिक सेवा के अधिकारियों (आर्इ.ए. एस., आर्इ.पी.एस.) को भी जिस राज्य में उनकी नियुकित होती है, वहां की भाशा का प्रशिक्षण दिया जाता है। न्यायधीषों के लिए भी इस प्रकार की व्यवस्था की जानी चाहिए।
उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों में शासकों-प्रशासकों के अनुसार माना कि वहां कुछ कठिनार्इ है। परन्तु सत्र, अधीनस्थ, जिला न्यायालयों में तो अपराधिक प्रक्रिया संहिता-272, सिविल प्रक्रिया संहित-137 के अनुसार, वहां-2 की राजभाशा में कार्य करने का प्रावधान है और अन्य राज्यों के न्यायाधीशों का प्रश्न भी नहीं है। फिर भी अनेक राज्यों में अंषत: या कुछ न्यायालयों में पूर्णरूप से अंग्रेजी में कार्य किया जा रहा है। अनेक न्यायालयों में वहां-वहां की राजभाशा के अनुसार कम्प्यूटर और स्टेनो, टार्इपिस्ट नहीं हंै। इस कारण से बहस और सुनवार्इ वहां की भाशा में होने के उपरान्त भी निर्णय अंग्रेजी में दिये जाते हंै। अनेक न्यायालयों में बहस भी अंग्रेजी में की जाती है। ध्यान में यह आता है, कि कुछ कठिनार्इयों का बहाना बनाकर वास्तव में शासन-प्रषासन के द्वारा जनता को अपने अधिकारों से वंचित रखने के शडयंत्र के तहत, भारतीय भाशाओं में कार्य करने में बनावटी रूकावटें निर्माण की जा रही हैं।
अनेक राज्यों में वहां-2 के कानून भी प्रथम अंग्रेजी में बनाए जाते हंै। बाद में कुछ का राज्य की राजभाशा में भाशांतरण किया जाता है, कुछ का नहीं भी किया जाता हैै। वास्तव में शासन-प्रषासन में बैठे हुए अधिकतर लोग, भारतीय भाशाओं को स्थापित नहीं होने देना चाहते। यह अनुभव सिद्ध बात है। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के द्वारा पिछले दो वर्श में केन्द्र, विभिन्न राज्यों एवं उनके संस्थानों को उनके राजभाशा के कानून के विरूद्ध कार्य करने के संदर्भ में दो हजार से भी अधिक पत्र लिखे गए हैं, जिनमें से कुछ का सकारात्मक परिणाम आया है। कुछ राज्य सरकारेंकार्यालय तो उत्तर देने को भी आवष्यक नहीं समझते।
इसी प्रकार अनेक राज्यों में क्रमश: विधि की षिक्षा का माध्यम भी अंग्रेजी है या अंग्रेजी माध्यम किया जा रहा है। सरकार के द्वारा राश्ट्रीय विधि विश्वविधालयों की स्थापना की गर्इ है, उनका माध्यम भी केवल अंग्रेजी है। विधि-सेवा से सम्बनिधत प्रतियोगी परीक्षाओं की भी इसी प्रकार की सिथति देखने को मिलती है।
जब तक शासन-प्रषासन, उच्च शिक्षा एवं प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त नहीं की जाएगी तब तक भारतीय भाशाओं को स्थापित करना असंभव है। इस हेतु देशभर में भारतीय भाशाओं के प्रतिश्ठान हेतु एक बड़ा आन्दोलन, अभियान चलाने की आवश्यकता है। इसका प्रारंभ शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने कर भी दिया है। आवष्यकता है, देश की हजारों संस्थाएँ एवं विद्वान, स्वभाशा प्रेमी इस हेतु एक मंच पर साथ आकर आवाज उठायें, तोे इस आन्दोलन का देशव्यापी स्वरूप बनेगा। तब शासन-प्रषासन का दिमाग भी ठीक होगा और भारतीय भाशाओं में शासन-प्रषासन का कार्य एवं सभी स्तर की शिक्षा, न्यायालयों और प्रतियोगी परीक्षाओं का माध्यम भी अपनी भाशाएं हाेंगी। आओ, इस विश्वास के साथ, भारतीय भाशाओं को न्याय दिलाने हेतु, एक राश्ट्रव्यापी आन्दोलन खड़ा करने के लिए हम संकल्पबद्ध हों। यही मेरी प्रार्थना है।
श्री अतुल कोठारी
(सचिव, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास)
सरस्वती बाल मनिदर, जी ब्लाक नारायणा विहार
नर्इ दिल्ली-110028, सम्पर्क सूत्र :-9868100445
र्इमेल :- ंजनसेेनदहउंपसण्बवउ

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